![]() |
| श्री श्री वसु-जाह्नवा-रमण जयतः |
एक लम्बे आरसे से प्रेम कहानी लिखने को जी कर रहा। पर मैं ठहरी सायेंस की छात्रा, मुझनें लिटरेरी ज्ञान बिलकुल नहीं है, भाषा पर दखल, इसलिए झिझक रही थी। फिर सोचा फेसबुक पर रोज़ रोज़ इतना कचरा परोसा जाता है, तो इसमें एक योगदान मेरा भी सही - किसी को क्या फर्क पड़ेगा ? 😄
इस कहानी में विशेषता सिर्फ इतनी है कि यह सौ प्रतिशत असली है। मैं बहुत ही रूखी-सूखी सायेंसी हूँ। मैंने पूरी जिंदगी जर्नल और थीसिस के अलावा कुछ नहीं लिखा | मुझमें कल्पना शक्ति तो है नहीं | अतएव इस कहानी में एक भी डायलाग काल्पनिक नहीं है | नेहा ने अपनी डायरी में जैसे लिखा, चक्क वैसे उठाके मैंने यहाँ डाल दिया।
क्या इसका अर्थ यह है कि केवल नेहा ही इस कहानी के पात्रों को जानती है, मैं नहीं ? ऐसा नहीं है मैं भी इनको जानती हूँ , किन्तु उतना अच्छे से नहीं जितना कि नेहा। इसलिए मैंने नेहा की डायरी का सहारा लिया है | इतने सालों तक मुझे लगता था यह कहानी नेहा की है, किन्तु बाद में लगा - नहीं यह तो सेलिना की कहानी है - और आजकल लगता है यह सेलिना नहीं, अपितु रणजीत ही इस स्टोरी का प्रोटागोनिस्ट है | पर जैसा कि मैंने कहा, मुझे तो नेहा की दृष्टिकोण से ही बताना होगा, क्योंकि नेहा रणजीत को जितना जानती थी - जो कि स्वल्प था - मैं रणजीत को उसका एकांश ही जानती हूँ |
चलिए, एक पक्के सायेंसी की तरह शुरू से शुरू करती हूँ | अच्छा, before i start, एक बात और ! This story spans over five years. इसलिए यह काफी लम्बी है। मेरी सलाह है आप इसे स्किप करें।
नेहा ट्युटोरियल से लौ रही थी | वह कहते हैं न - सशक्त नारी पीडिता नहीं बनतीं, दयनीय नहीं दिखतीं, किसी को निरंतर दूषती हुईं सर पकड़के बैठी नहीं रहतीं, बस खड़ी होकर डील करती हैं | पंद्रह साल की उम्र से earn करके खुद का खर्चा उठा रही नेहा भी ऐसी ही थी | बस में बैठे बैठे वह अपने इस समस्या का हल सोच रही थी - पूरी लगन से | उसे नहीं मालूम था कि उसके जीवन में ऐसा कुछ घटनेवाला था, जो अनेक अनेक वर्षों बाद जब वह पीछे मुड़कर देखेगी, यही उसके जीवन के सब से सुहाने, सब से सुकून भरे पल होंगे | और शायद ऐसा संग उसे फिर कभी नहीं मिलेगा |
(क्रमशः)

No comments:
Post a Comment